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काशी को बदनाम करने की साज़िश – सच क्या है और पर्दे के पीछे कौन।

काशी को बदनाम करने की साज़िश – सच क्या है और पर्दे के पीछे कौन।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर आधारित विशेष रिपोर्ट

आज सवाल सिर्फ़ काशी का नहीं है…

आज सवाल उस सभ्यता का है,

जिसने दुनिया को सत्य, अहिंसा और संस्कार का रास्ता दिखाया।

आज सवाल उस काशी का है,

जिसे बदनाम करने की एक सोची-समझी साज़िश रची जा रही है।

और सवाल ये भी है कि

क्या इस साज़िश का पर्दाफाश होगा?

क्या सच सामने आएगा?

और क्या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस लड़ाई में अकेले हैं?

काशी – आस्था, संस्कृति और राजनीति का केंद्र

काशी सिर्फ़ एक शहर नहीं है,

काशी एक विचार है,

एक सभ्यता है,

एक परंपरा है जो हज़ारों साल पुरानी है।

लेकिन आज वही काशी

सोशल मीडिया से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक,

नकारात्मक खबरों का शिकार बनाई जा रही है।

कभी वीडियो वायरल होते हैं,

कभी अधूरी तस्वीरें,

तो कभी अफवाहों का ऐसा तूफ़ान

कि सच दब जाता है और झूठ वायरल हो जाता है।

यूपी सरकार का दावा है कि

काशी को बदनाम करने की ये कोशिशें

सुनियोजित हैं, संगठित हैं और राजनीतिक हैं।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कई मंचों से साफ़ कहा है कि –

जो लोग विकास से डरते हैं,

वो भ्रम फैलाते हैं।

जो लोग बदलाव नहीं चाहते,

वो काशी की छवि को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करते हैं।”

2017 से पहले की काशी

और आज की काशी —

इन दोनों में ज़मीन-आसमान का अंतर है।

✔️ काशी विश्वनाथ कॉरिडोर

✔️ घाटों का सौंदर्यीकरण

✔️ सड़कों का चौड़ीकरण

✔️ पर्यटन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी

✔️ रोजगार के नए अवसर

✔️ क्रूज़ सेवा, रोपवे परियोजना

✔️ स्वच्छता अभियान

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक,

काशी में पिछले 6 सालों में

पर्यटकों की संख्या 3 गुना बढ़ी है।

जब भी काशी में विकास होता है,

उसी समय विवाद खड़ा किया जाता है।

कभी कहा जाता है –

“पुरानी काशी खत्म की जा रही है”

कभी कहा जाता है –

गरीबों को उजाड़ा जा रहा है

कभी कहा जाता है –

आस्था से खिलवाड़ हो रहा है

लेकिन सवाल ये है –

क्या ये सारे आरोप तथ्य पर आधारित हैं?

या सिर्फ़ राजनीतिक एजेंडा?

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साफ़ चेतावनी दी है कि –काशी की छवि खराब करने वालों पर

कानूनी कार्रवाई होगी।

उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि –

👉 फेक न्यूज़ पर तुरंत कार्रवाई

👉 अफवाह फैलाने वालों की पहचान

👉 सोशल मीडिया मॉनिटरिंग

👉 विकास कार्यों की पारदर्शी जानकारी जनता तक

आज अफवाहें

व्हाट्सऐप से पैदा होती हैं,

ट्विटर से फैलती हैं,

और फेसबुक से पक्की कर दी जाती हैं।

एक छोटा सा क्लिप,

बिना संदर्भ के वायरल कर दिया जाता है।

और फिर वही क्लिप

पूरी काशी को कटघरे में खड़ा कर देता है।

विपक्ष पर आरोप है कि

वो काशी को मुद्दा बनाकर

राजनीतिक रोटियाँ सेंक रहा है।

जब विकास दिखे,

तो सवाल उठाओ।

जब रोजगार मिले,

तो विवाद खड़ा करो।

क्योंकि

अगर काशी चमकी,

तो योगी मॉडल मजबूत होगा।

और यही कुछ लोगों को मंजूर नहीं।

योगी आदित्यनाथ कोई साधारण मुख्यमंत्री नहीं हैं।

उनकी राजनीति सीधी है –

कठोर निर्णय, साफ़ संदेश और ज़ीरो टॉलरेंस।

इसी वजह से

वो समर्थन भी पाते हैं

और विरोध भी।

लेकिन सवाल ये है –

क्या काशी को बदनाम करके

योगी को कमजोर किया जा सकता है?

या फिर

ये साज़िश खुद बेनकाब हो जाएगी?

ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि –

काशी की आम जनता

विकास से संतुष्ट है।

दुकानदार कहते हैं –

“पहले दुकानें बंद रहती थीं, अब ग्राहक आते हैं।”

नाविक कहते हैं –

अब रोज़गार बढ़ा है, घाट चमक रहे हैं।

महिलाएं कहती हैं –

अब शहर सुरक्षित लगता है।

सच ये है कि काशी बदल रही है।

और हर बदलाव को विरोध झेलना पड़ता है।

सच ये भी है कि

फेक न्यूज़, अफवाह और प्रोपेगेंडा

आज का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है।

और सच ये है कि

काशी को बदनाम करने की कोशिश

दरअसल विकास को रोकने की कोशिश है।

क्या हम

व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से निकली खबरों पर भरोसा करेंगे?

या

ग्राउंड रियलिटी देखेंगे?

क्या हम

अपनी सभ्यता को बदनाम करने वालों को पहचानेंगे?या

खामोशी से तमाशा देखेंगे?

काशी की लड़ाई

सिर्फ़ एक शहर की नहीं,

बल्कि भारत की पहचान की लड़ाई है।

और इस लड़ाई में

सच को सामने लाना हम सबकी जिम्मेदारी है।

न्याय की बात

Nyaykibaat.com

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