शंकराचार्य पद विवाद: आस्था, अधिकार और राजनीति के टकराव की पूरी कहानी।
देश के सबसे प्रतिष्ठित धार्मिक पदों में से एक — शंकराचार्य का पद आज विवाद, आरोप और राजनीति के घेरे में है। जिस पद को कभी ज्ञान, तपस्या और सनातन परंपरा का प्रतीक माना जाता था, वही पद अब सार्वजनिक बहस, कानूनी लड़ाई और राजनीतिक बयानबाज़ी का केंद्र बन गया है।
माघ मेले के दौरान दो संतों के बीच हुई तीखी बहस ने इस विवाद को और हवा दे दी है। सवाल ये है कि आखिर ज्योतिर्मठ का असली शंकराचार्य कौन है? और क्या धार्मिक पद अब राजनीति की बिसात बन चुके हैं?
शंकराचार्य पद को लेकर चल रहा विवाद कोई नया नहीं है, लेकिन हालिया घटनाओं ने इसे फिर सुर्खियों में ला दिया है। खुद को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य बताने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती के बीच माघ मेले में हुई तीखी बहस ने पूरे संत समाज को दो धड़ों में बांट दिया है।
माघ मेला, प्रयागराज — जहां साधु-संतों की एकता का संदेश दिया जाता है, वहीं इस बार मतभेदों की आवाज़ गूंजती रही। दोनों संतों के समर्थकों के बीच तनाव की स्थिति बनी और मामला शब्दों की लड़ाई से आगे बढ़कर प्रशासन और अदालत तक पहुंच गया।
विवाद की जड़ क्या है?
दरअसल, ज्योतिर्मठ शंकराचार्य पद को लेकर लंबे समय से असमंजस बना हुआ है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद दावा करते हैं कि उन्हें परंपरागत विधि से शंकराचार्य घोषित किया गया है, जबकि स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हैं।
इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का हवाला देकर दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क पेश कर रहे हैं। कोई इसे अपने पक्ष में बता रहा है, तो कोई इसे गलत व्याख्या करार दे रहा है। नतीजा — धार्मिक मुद्दा अब कानूनी और राजनीतिक बहस में बदल चुका है।
आजतक से बातचीत में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने क्या कहा?
गुरुवार को आजतक से बातचीत करते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा:
“शंकराचार्य पद कोई राजनीतिक पद नहीं है। यह सनातन परंपरा का आधार स्तंभ है। इसे विवाद में घसीटना और राजनीतिक बयानबाज़ी करना, धर्म के साथ अन्याय है।”
उन्होंने साफ कहा कि उन्हें परंपरा, शास्त्र और गुरु परंपरा के अनुसार शंकराचार्य घोषित किया गया है और वह किसी भी राजनीतिक दबाव से डरने वाले नहीं हैं।
स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती का पक्ष
वहीं दूसरी ओर, स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि
“परंपरा का पालन किए बिना कोई शंकराचार्य नहीं बन सकता। आज धर्म को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।”
उन्होंने आरोप लगाया कि शंकराचार्य पद को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है और साधु-संतों को गुमराह किया जा रहा है।
राजनीति की एंट्री
जैसे ही यह विवाद बढ़ा, वैसे ही राजनीति भी इसमें कूद पड़ी। कई राजनीतिक दलों के नेताओं ने बयान दिए — कुछ ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का समर्थन किया, तो कुछ ने पूरे मामले को धार्मिक संस्थाओं के अंदरूनी मसले बताते हुए दूरी बना ली।
विश्व हिंदू परिषद, संत समाज और अन्य धार्मिक संगठनों ने भी चिंता जताई है कि इस विवाद से सनातन धर्म की छवि को नुकसान पहुंच रहा है।
रामभद्राचार्य का बयान
जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने भी इस विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा:
“अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस मिलना सही है। उन्होंने परंपराओं के खिलाफ जाकर अन्याय किया है।”
इस बयान ने विवाद को और गहरा कर दिया, क्योंकि रामभद्राचार्य का प्रभाव संत समाज में काफी बड़ा माना जाता है।
प्रशासन की चिंता
प्रयागराज प्रशासन भी इस पूरे विवाद को लेकर सतर्क है। माघ मेले जैसे बड़े आयोजन में संतों के बीच टकराव, कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है। इसी वजह से प्रशासन ने कई बार दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है।
धर्म या राजनीति?
अब बड़ा सवाल ये है —
क्या शंकराचार्य पद जैसी विशुद्ध धार्मिक परंपरा को राजनीति के अखाड़े में खींचा जा रहा है?
या फिर यह सिर्फ अधिकार और मान्यता की लड़ाई है?
धार्मिक जानकारों का मानना है कि ऐसे विवादों से आम श्रद्धालु भ्रमित होते हैं और सनातन परंपरा की गरिमा को ठेस पहुंचती है।
क्या होगा आगे?
फिलहाल मामला अदालत, संत समाज और जनमत — तीनों के बीच उलझा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के अगले आदेश और संत समाज की बैठक पर सबकी नजर टिकी है।
लेकिन एक बात तय है —
जब धर्म के मंच पर विवाद गूंजने लगें, तो उसका असर सिर्फ साधु-संतों तक नहीं रहता, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था पर पड़ता है।
न्याय की बात।
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