प्राथमिक विद्यालय लालीपुर बना प्रशासनिक लापरवाही का जीता-जागता उदाहरण, बच्चों की जान से हो रहा खिलवाड़।
लालीपुर स्थित प्राथमिक विद्यालय की बदहाल स्थिति ने शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह विद्यालय आज पढ़ाई का नहीं, बल्कि संभावित दुर्घटनाओं का केंद्र बन चुका है, जहाँ छोटे-छोटे मासूम बच्चे हर दिन मौत के साये में बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं।
विद्यालय में न तो पीने के पानी की व्यवस्था है, न ही शौचालय की सुविधा। सरकार द्वारा शिक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के दावे यहाँ खोखले साबित हो रहे हैं। बालिकाओं के लिए बाथरूम न होना प्रशासन की घोर लापरवाही और असंवेदनशीलता को दर्शाता है।
विद्यालय तक पहुंचने के लिए कोई सुरक्षित रास्ता नहीं है। ऊपर से स्कूल परिसर में न बाउंड्री वॉल है, न गेट, जिससे बच्चों की सुरक्षा पूरी तरह भगवान भरोसे है। विद्यालय के ठीक बगल में स्थित तालाब लगातार खतरे की घंटी बजा रहा है। कई बार बच्चों के साथ दुर्घटना होते-होते बची, लेकिन प्रशासन ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
पढ़ाई की स्थिति भी शर्मनाक है। डेस्क-बेंच के अभाव में बच्चे आज भी दरी पर बैठने को मजबूर हैं। जर्जर छतें, टूटे दरवाज़े और खिड़कियाँ किसी भी समय बड़े हादसे को दावत दे रही हैं। सवाल यह है कि क्या प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना का इंतज़ार कर रहा है?
विद्यालय की हेडमास्टर और शिक्षक वर्ग भी मानसिक दबाव में कार्य कर रहे हैं। उनका कहना है कि वे हर दिन डर के माहौल में स्कूल चलाते हैं, क्योंकि अगर किसी बच्चे के साथ कुछ हो गया, तो जवाबदेही किसकी होगी? कई बार उच्च अधिकारियों को अवगत कराया गया, लेकिन शिकायतें फाइलों में दबकर रह गईं।
स्थानीय ग्रामीणों और अभिभावकों में गहरा रोष है। लोगों का साफ कहना है कि यदि जल्द से जल्द विद्यालय की स्थिति में सुधार नहीं किया गया और कोई अप्रिय घटना घटती है, तो इसकी सीधी जिम्मेदारी शिक्षा विभाग, ब्लॉक प्रशासन और जिला प्रशासन की होगी।
अब बड़ा सवाल यह है कि
क्या प्रशासन किसी बच्चे की जान जाने के बाद जागेगा?
या फिर समय रहते प्राथमिक विद्यालय लालीपुर को सुरक्षित बनाकर अपनी जिम्मेदारी निभाएगा?
न्याय की बात।
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