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शमशान घाट निर्माण में घोटाले की लीपापोती! घटिया सामग्री पर पर्दा डालने और सबूत मिटाने की कोशिश पर उठे जांच के सवाल।

शमशान घाट निर्माण में घोटाले की लीपापोती! घटिया सामग्री पर पर्दा डालने और सबूत मिटाने की कोशिश पर उठे जांच के सवाल।

शमशान घाट निर्माण जैसे संवेदनशील और जनहित से जुड़े कार्य में घटिया सामग्री का उपयोग होना सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि जनता की भावनाओं और सरकारी योजनाओं के साथ सीधा खिलवाड़ है। ग्रामीण विकास योजनाओं के तहत बनाए जा रहे शमशान घाटों का उद्देश्य अंतिम संस्कार के लिए सम्मानजनक और सुरक्षित स्थल प्रदान करना है, लेकिन जब निर्माण में 3 नंबर की ईंट, घटिया सीमेंट, बालू में मिट्टी की मिलावट, और मानक से कम सरिया का उपयोग किया जाता है, तो यह योजना अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती है।

इससे भी गंभीर बात तब सामने आती है, जब शिकायत उठने के बाद ठेकेदार या संबंधित पक्ष लीपापोती कर सबूत मिटाने की कोशिश करने लगते हैं। दीवारों पर नया प्लास्टर चढ़ाकर खराब ईंटों को छिपाना, रातों-रात मलबा हटाना, सामग्री बदल देना, या रिकॉर्ड में हेराफेरी कर जांच को प्रभावित करना, यह दर्शाता है कि मामला साधारण गलती नहीं, बल्कि सोची-समझी साजिश है।

अब सबसे बड़ा सवाल है — जांच कौन करवाएगा? और कब तक रिपोर्ट आएगी?

ऐसे मामलों में जांच कराने का अधिकार और जिम्मेदारी कई स्तरों पर होती है:

1. ग्रामीण विकास विभाग (Rural Development Dept.)

2. प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO)

3. जिला प्रशासन (DM/DC)

4. तकनीकी जांच टीम (Engineering विभाग)

5. राज्य सतर्कता विभाग (Vigilance)

6. लोकायुक्त (Lokayukta) — यदि मामला बड़े स्तर के भ्रष्टाचार का हो

7. NREGS/15वें वित्त आयोग की ऑडिट टीम — यदि फंड इनके तहत जारी हुआ हो

सामान्यतः शिकायत के बाद प्रारंभिक जांच 7 से 30 दिनों के भीतर शुरू हो जाती है, जबकि तकनीकी और विस्तृत रिपोर्ट 60 से 90 दिनों तक में आती है। लेकिन यदि सबूत मिटाने की कोशिश साबित होती है, तो जांच का स्तर बढ़ाकर सतर्कता विभाग या लोकायुक्त तक भी पहुंच सकता है, जिसमें कार्रवाई और FIR तक दर्ज हो सकती है।

जनता की मांग है कि शमशान घाट निर्माण में हुए इस घोटाले की जांच स्वतंत्र, तकनीकी, और समयबद्ध हो, ताकि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो और भविष्य में योजनाओं की गुणवत्ता से कोई समझौता न किया जा सके। यह जांच सिर्फ कागजों में नहीं, बल्कि धरातल पर दिखनी चाहिए, क्योंकि यह न्याय की बात नहीं ।

जनता की आवाज है!

न्याय की बात।

nyaykibaat.com

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